■■ बदले जिंदगी के मायने ■■ दौड़ती ,भागती ,हाँफती दुनिया पिछले कुछ दिनों से थम सी गई है । मानों वक्त अपनी जगह रुक गया है। अभी न तो अहले सुबह बच्चों को कच्ची नींद से जगाने की जरूरत है और ना किचन में सूरज के निकलने से पहले आती कुकर की सीटीयों की आवाजें है। एक इत्मीनानी, एक शांति सब तरफ़ व्याप्त हो गई है । दफ्तर जाने वाले साहब जो कल तक कच्ची- पक्की टिफिन जल्दी में लेकर दौड़ते नज़र आते थे। अब वे भी सुबह देर तक ऊंघते नज़र आ रहे हैं। किसी को कोई जल्दी नहीं है । आज लॉक डाउन ने सबको वो दिया है जिसे सभी बहुत मिस कर रहे थे ---- "वक्त "। अब सब के पास वक्त है । लेकिन यह वक्त जिन परिस्थितियों मैं मिला है वे परिस्थितियां मानव सभ्यता के लिए किसी श्राप से कम नहीं है। घर की चारदीवारी के अंदर हम सिमट गए हैं । कल तक साथ घूमते, हमारे मित्र हमसे दूर हो गए हैं ।एक महामारी ने हमारे बीच एक तरह की दूरी पैदा कर दी है । विकेंडस आज भी आ रहे हैं ,लेकिन मॉल्स रेस्तरां और थियेटर सभी खाली है । जो लोग वीकेंड्स का मतलब ही मॉल जाना, सिनेमा जाना और महंगे रेस्तरां में खाना समझते थे। उनके लिए यह घड़ी किसी...
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