बदले ज़िंदगी के मायने
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■■ बदले जिंदगी के मायने ■■
दौड़ती ,भागती ,हाँफती दुनिया पिछले कुछ दिनों से थम सी गई है । मानों वक्त अपनी जगह रुक गया है। अभी न तो अहले सुबह बच्चों को कच्ची नींद से जगाने की जरूरत है और ना किचन में सूरज के निकलने से पहले आती कुकर की सीटीयों की आवाजें है। एक इत्मीनानी, एक शांति सब तरफ़ व्याप्त हो गई है । दफ्तर जाने वाले साहब जो कल तक कच्ची- पक्की टिफिन जल्दी में लेकर दौड़ते नज़र आते थे। अब वे भी सुबह देर तक ऊंघते नज़र आ रहे हैं।
किसी को कोई जल्दी नहीं है । आज लॉक डाउन ने सबको वो दिया है जिसे सभी बहुत मिस कर रहे थे ---- "वक्त "।
अब सब के पास वक्त है । लेकिन यह वक्त जिन परिस्थितियों मैं मिला है वे परिस्थितियां मानव सभ्यता के लिए किसी श्राप से कम नहीं है। घर की चारदीवारी के अंदर हम सिमट गए हैं ।
कल तक साथ घूमते, हमारे मित्र हमसे दूर हो गए हैं ।एक महामारी ने हमारे बीच एक तरह की दूरी पैदा कर दी है । विकेंडस आज भी आ रहे हैं ,लेकिन मॉल्स रेस्तरां और थियेटर सभी खाली है । जो लोग वीकेंड्स का मतलब ही मॉल जाना, सिनेमा जाना और महंगे रेस्तरां में खाना समझते थे। उनके लिए यह घड़ी किसी तकलीफ से कम नहीं है ।
तथाकथित बड़े घरों के बच्चे और उनके परिजन एक वीकेंड में हजारों रुपए फूंक आते थे। आज वह भी घर में जलेबी और गुलाब जामुन बनाकर खा रहे हैं ।
बाहर निकलने पर लगी पाबंदी से सड़कों पर वाहन कम चल रहे हैं । कहीं कोई भागा-भागी नहीं ।
प्रदूषण भी काफी हद तक नियंत्रित हो गया है । प्लास्टिक का कचरा कम दिखता है। सोचने वाली बात बात यह है कि आज भी वही धरती है ,वही हम लोग हैं सब कुछ वैसा का वैसा ही है फिर यह बदलाव कैसे आया?
एक विषाणु जिसने अपने शिकंजे में आज हमें इस कदर जकड़ रखा है कि हमारे जीवन के मायने ही बदल गए हैं। हमारी प्राथमिकताएं ही बदल गई हैं ( भले ही अस्थायी तौर पर )।
तकरीबन 2 महीने हो गए हैं बाजार बंद हुए। ना तो कोई अब रेस्तरां जा रहा है और ना कोई भव्य मॉल ।घर की चारदीवारी में हमारी दुनिया सिमट कर रह गई है और यह स्थिति सिर्फ हमारे देश की नहीं वरन संपूर्ण विश्व की है । यह विषाणु इतना ताकतवर है कि इसने बड़ी- बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को हिला कर रख दिया है। इसका तोड़ कब तक मिल पाएगा ,कोई नहीं जानता । तब तक सिवाय प्रतीक्षा करने के और कोई चारा नहीं । लेकिन आज की परिस्थितियों ने कुछ ऐसे प्रश्न खड़े किए हैं कि जिस पर गम्भीरता से सोचने की आवश्यकता है।
जो लोग भौतिक सुविधाओं, बाहर के खाने और बेमतलब की चीजों के पीछे पैसा पानी की तरह बहाकर स्वयं का और अपने परिजनों का स्वास्थ्य बिगाड़ रहे थे । आज वह भी घर के बने खाने का उपयोग कर रहे हैं । बाहर अनावश्यक दौड़ते वाहनों ने पर्यावरण की ऐसी की तैसी कर रखी थी ।
आज हर तरह का प्रदूषण कम हो गया है ।टीवी पर दिखाए जाने वाले सास बहू और किचन पॉलिटिक्स पर आधारित उन बकवास धारावाहिकों का प्रसारण भी थम चुका है। उनकी जगह रामायण, महाभारत और शक्तिमान जैसे संस्कारी धारावाहिकों ने ले ली है। मैं मानती हूं कि अर्थव्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित हो रही है । कितने लोग अपनी जान से हाथ धो चुके हैं ।इस बीमारी की वजह से कितने लोग अपनों से भी दूर है । आवागमन रुक गया है। कुछ बच्चे अपने पिता से दूर है ।
इन सब के बावजूद एक विचारणीय प्रश्न यह भी है कि क्या हम इतने कमजोर है कि इन भौतिक सुविधाओं के बिना जी ना सके ?
बाहरी खाने से पेट को डस्टबिन बनाने के लिए हम कभी मजबूर नहीं हो सकते ? साथ ही जब वास्तविक रूप से हम परेशान हो तो सबसे बड़ा संबल अपना परिवार होता है । यह सब हमने पहले ही समझ जाना चाहिए था, परंतु इस विषाणु द्वारा जबरन हमें यह सब सिखाया जा रहा है। अच्छा होता कि हम सब पहले ही चेत गए होते तो आज तस्वीर कुछ और होती ।
बढ़ती महत्वाकांक्षा और स्वयं को शक्तिशाली सिद्ध करने की इस अंधी प्रतिस्पर्धा ने संपूर्ण मानव जाति को खतरे में डाल दिया है । लेकिन इन सबके बीच जो एक अच्छी शुरुआत हुई है, उसका अगर हम परंपरा की तरह पालन कर पाए तो यह हमारे लिए किसी वरदान से कम नहीं होगा । अपने आप को भौतिक सुखों का गुलाम नहीं उसका स्वामी बनाएं ।
अलका 'सोनी'
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