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एक ठांव चाहती हूँ

ना बांधो मुझे बंधनों में  खुद की एक ठावँ चाहती हूं  अपने सपनों में जो बसाया था कभी  वह गांव चाहती हूं  सुनती रही सब की सदा  चलती रही  मन से तुम्हारी  सींचा था जिन्हें  कभी नेह से  उन दरख़्तों की  छांव चाहती हूं  ना बांधो मुझे बंधनों में  खुद की एक  ठावँ चाहती हूं  चलती आई तुम्हारे बनाये  निशानों पर जाने कब से  अब निशान छोड़ते हुए  पथ पर अपने  पांव चाहती हूं  दम तोड़ते पुराने  खंडहरों से मुक्ति का  आसमान चाहती हूं  अपने सपनों में  बसाया था कभी  जो वह गांव चाहती हूं ना बांधों बन्धनों में खुद की एक ठावँ चाहती हूँ। ©®अलका 'सोनी'

पिता

" प्यार है कितना  कभी नहीं जतलाता है चोट लग जाये तो दर्द में भी हंसना सिखाता है..... एक पिता ही है जो पूरा बाज़ार  खरीद लाता है " अलका 'सोनी'

सत्य सरल है

कौन कुबूल करता है कि वो भूल करता है चालाकियों से छिपाता चला जाता है अपनी हर गलती और कमजोरी को मिथ्या प्रपंच में फंसता ही जाता है नीचे और नीचे जहां से उबर पाना मुश्किल हो जाता है उसके लिए वह खड़ा करता  जाता है  रेत के महल जो बह जाता है पानी की पतली सी एक धार में रक्त-अस्थि से बना यह शरीर और उसके अंदर किसी कोने में दुबके हम भूल जाते हैं अपना अस्तित्व भी इस शरीर के बाहर अनन्त ऊंचे आकाश तक पंहुच हो सकती है क्यो भूल जाते हैं हम सत्य के साथ खड़ा रहना इतना भी कठिन नहीं सत्य, सरल है झूठ से इसके लिए आवश्यकता नहीं होती किसी प्रयत्न की सूर्य  सा  सत्य बढ़ता ही जाता है और झूठ उतना ही गहरा  धंसता ही जाता है।

बहिष्कार है....

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मुस्कुराना सीख लो

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ज़िंदगी

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" ऑनलाइन " के नखरे

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दो शब्द ,जिससे जुड़े रहने में हम भारतीय अपनी शान समझते हैं। एक तो " अंग्रेजी " और दूसरा महान शब्द " प्राइवेट " है। अभी हाल -फिलहाल में एक और शब्द बड़ी चतुराई से इनके साथ हो लिया है, वह है " ऑनलाइन "..... अब इनकी तिकड़ी क्या गुल खिला रही है, यह हम सब खासकर महिलाएं अच्छी तरह से समझ रही होंगी। यह तिकड़ी और तिकड़मबाजी ज़्यादा पुराना नहीं है। बस दो-तीन महीने पहले ही जन्म लिया है इसने। इसी कोरोना के दिये अनेकों उपहारों में से एक है।  मार्च के महीने से हर साल नया सत्र शुरू होता था। जब पुराने वर्ग से बच्चे नये वर्ग में जाते थे। नई किताबें, यूनिफॉर्म, नया उत्साह देखते बनता था। कुछ बच्चों के लिए तो विद्यालय के प्रांगण में पहली बार कदम पड़ते थे दाखिला लेने के बाद। लेकिन इस साल ऐसा कुछ नहीं हो पाया। महामारी के फैलने और फिर लॉक डाउन के कारण सबका उत्साह ठंढा पड़ गया। फिर जब बात आई कि जब पढ़ाई नहीं तो फीस नहीं। तब जाकर इनकी खुराफाती खोपड़ी में ऑनलाइन पढ़ाई के कीड़े ने रेंगना शुरू किया।  बस फिर क्या, धड़ाधड़ ऑनलाइन क्लासेस के टाइम स्लॉट आने शुरू हो गए। आप अपने घर में नहीं ह...