एक ठांव चाहती हूँ

ना बांधो मुझे बंधनों में 
खुद की एक
ठावँ चाहती हूं 
अपने सपनों में जो
बसाया था कभी 
वह गांव चाहती हूं 
सुनती रही सब की सदा 
चलती रही 
मन से तुम्हारी 

सींचा था जिन्हें 
कभी नेह से 
उन दरख़्तों की 
छांव चाहती हूं 
ना बांधो मुझे बंधनों में 
खुद की एक 
ठावँ चाहती हूं 

चलती आई तुम्हारे बनाये 
निशानों पर जाने कब से 
अब निशान छोड़ते हुए 
पथ पर अपने 
पांव चाहती हूं 

दम तोड़ते पुराने 
खंडहरों से मुक्ति का 
आसमान चाहती हूं 
अपने सपनों में 
बसाया था कभी 
जो वह गांव चाहती हूं
ना बांधों बन्धनों में
खुद की एक ठावँ चाहती हूँ।

©®अलका 'सोनी'

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