सत्य सरल है

कौन कुबूल करता है कि

वो भूल करता है

चालाकियों से छिपाता

चला जाता है अपनी

हर गलती और

कमजोरी को

मिथ्या प्रपंच में

फंसता ही जाता है

नीचे और नीचे


जहां से उबर पाना

मुश्किल हो जाता है

उसके लिए

वह खड़ा करता 

जाता है 

रेत के महल

जो बह जाता है

पानी की पतली सी

एक धार में


रक्त-अस्थि से बना

यह शरीर और उसके

अंदर किसी कोने में

दुबके हम

भूल जाते हैं अपना

अस्तित्व भी

इस शरीर के बाहर

अनन्त ऊंचे आकाश तक

पंहुच हो सकती है

क्यो भूल जाते हैं हम


सत्य के साथ खड़ा रहना

इतना भी कठिन नहीं

सत्य, सरल है झूठ से

इसके लिए आवश्यकता

नहीं होती किसी प्रयत्न की

सूर्य  सा  सत्य

बढ़ता ही जाता है और

झूठ उतना ही गहरा 

धंसता ही जाता है।


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