सालों बाद

★★ सालों बाद ★★

हाँ, सालों बाद मैंने
देखा तुम्हें फिर भी 
तुम क्यों
अजनबी न लगे
पिघल गयी हैं
आंच से तेरी
अब ये बेड़ियाँ 
मुझे लोहे की न लगे

कम रखो ये
तपिश ज़रा तुम कि
ये सर्द मौसम ही
पिघलने न लगे
ताज़ा है अब तक
वो पहली छुअन
तुम्हारी, 
याद न आओ इतना
कहीं ये मन
फिर से बहकने न लगे

गूंज उठी थी 
तब तेरे आहट से ही
डर है कि फिर
मन जोरों से
धड़कने न लगे
चले जाओ कि
बगावत का शोर 
कोई मचने न लगे।

** अलका 'सोनी' **
लेखिका व कवयित्री
बर्नपुर, पश्चिम बंगाल।

Comments