अपनी बिसात है क्या
हम-तुम हैं क्या
और अपनी
बोलो बिसात
है क्या
उस परमपिता के
आगे किसी की
कोई औकात
है क्या
कितने युग आये
और घड़ियां
बीत गई
प्रलय की घोर
घटायें भी
सब कुछ डुबोकर
चली गई
कठिन क्षण में
मत सोचो कि
दिन है क्या और
रात है क्या
अहंकार मत करना
अपनी इस
कंचन जैसी
काया पर
मानव-धर्म निभा
पाओ तुम तो
कहो इससे अच्छी
बात है क्या।
©® अलका 'सोनी'
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