क्या सही किया
●● तुमने क्या सही किया ●●
हे सीता !!
तुमने क्या
यह सही किया
जो ना करना था
भला कहो
किसलिए किया
जग को कब
तेरी परख रही
कई विध किस्मत थी
तुझको निरख रही
जीवन था जब तक
तुमने बस आँच सही
यह बात अलग है कि
अब भी तुम
पूजी जाती हो
जब बात चले
पतिव्रता कि तुम ही
पहले गिनी जाती हो
लेकिन तुमने सुख
कोई यहां कब पाया था
पग पग पर देकर
इतनी परीक्षाएं
केवल तप में
जीवन बिताया था
देवी स्वरूपा होकर भी
मनुजों से छली गई
धरती से निकली तुम
हल से टकराकर
अंत भी पाया तुमने
इस धरती में समा कर
क्यों काली का रूप
तुमने धरा नहीं
विमूढ़ हुए जनमानस को
श्राप क्यों दिया नहीं
अश्रुधारा केवल होती
नारी की पहचान नहीं
अधम है वह समाज
जहां पर होता
नारी का सम्मान नहीं
अगर तुमने तभी
भृकुटि अपनी तानी होती
भरी सभा में पुनः
घसीटकर पांचाली नहीं
लाई गयी होती ।
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